क्यों कदर वो आंसमा जमीन से मिलने को बेताब है,क्यों चाहकर भी बेमौसम ही बारिश हुई ,जब जमीन को था यूं उन बादलों की नमी को महसूस करना तो क्यों उन खुदा ने उन बादलों को बरसाना ना चाहा।

जब चाहकर भी वो नमी हम महसूस ना कर पाए जो उस खुदा ने हमारे लिए रहमत -ए - नाजीर को अदा की हो ऐसी रुखसत चाह कर भी मंजूर ना हुई,क्यों उस खुदा की रहमत उस नाचीज़ को मशरूफ लगी क्यों चाह कर भी उस ख़ुदा के नेक दिली को वो समझ पाया,क्यों उसकी खुदा -ए - बंदगी में अपनी इबादत को कुबूल ना कर पाया,क्यों उसकी मंजूरी में खुद का इस्तकबाल समझ ना पाया,क्यों उसकी इनायत में उसकी भी रज्जा शामिल है वो समझ ना पाया।

ऐसा भी मालूम है कि वो मेरे खुदा के बिना कुछ भी नहीं है,उसकी ही बदौलत आज मैं हूं,उसकी ही इनायत में मैं मशगूल हूं,क्यों उसी की ही बंदगी करना अच्छा लगता है,क्यों उसी में उसी की बंदगी में रहना अच्छा लगता है