जहां थी ही ना कद्र कभी, वांहा आंसू बहाने से क्या फायदा,
जब था ही नहीं फ़र्क की हम कैसे है तो बात उल्टी समझे या सीधी क्या फ़र्क पड़ता है,अब जब फ़र्क ही ना रहा किसी से किसी को तो अपना वक़्त क्यों जाया करना? कहदेना हाल हमारा भी ठीक है वक़िक हुए तो पहचान लिया जाएगा।
