जहाँ दुनिया मुट्ठी में करने के
सपने देखे थे उस पुराने घर
के खिड़की, दरवाज़े कमरे
सब इतने छोटे छोटे लग रहे थे..
बड़ा होना भी कभी कभी
गुनाह लगता है।
मेरे निकलने पर ठहाकों की
आवाज बंद हो जाती थी,
सिर्फ 'भाभी' ही पीछे से
सुनाई देता था, वो नुक्कड़
भी अब वीरान है!
दीवारों पर जहाँ उकेरा गया
था नाम मेरा,
किसी का
पक्का मकान बन गया है वहाँ
वो मैदान जिसकी रौनक होते
थे हम
जंगल उग आया है वहाँ
घर हट गए माकन बन गया
सब चेहरे अनजान हैं,
जानती हूँ सब पहचानती कुछ
भी नहीं
अजब ''परायापन'' दिखाया है
इस शहर ने
[Pia Bajpiee]


