घर का सिलसिला तो बचपन से ही शुरू हुआ,
कभी मिट्टी तो कभी बालू का घर बनाया |
घर तो पिता जी ने भी बनाया,
जवानी के ख्वाबों को दीवारों पर सजाया |
पर लगा थोड़ी देर से बनाया,
हमारी किस्मत में ,घर मे रहना न आया |
जिन्दगी में अब एक नया घर,
जो पीजी या हास्टल कहलाया |
नए दोस्त, रंगीन जिंदगी, खुली बोतले, गिटार बजाया |
पर घर फिर याद आया,
घर जाने की तैयारी, बैग लिया, टिकट कटाया |
पर तीन चार दिन टिक पाया,
अपने घर में भी अतिथि ही बन पाया |
नौकरी मिलते ही एक ऐसा दौर आया,
हर दूसरा खूबसूरत चहरा दिल को भाया |
घर मुझको फिर घर याद आया,
आठ दस रिश्तो के बाद एक पर सब का मन आया |
ढोल,नगाड़े ,सहनाई बजने का दिन आया,
किसी के स्वागत में घर खूब सजाया |
चार दिन की चांदनी, अपना रास्ता फिर याद आया,
दोस्तो को छोड़ नए घर की तलाश का समय आया |
खनकती चुडिया, छनकती पायल,
किराये का मकान भी बहुत भाया |
शुरू हुई दुनियादारी घर से ऑफिस,
ऑफिस से घर और कुछ समझ में न आया |
एक दिन एक बाबा सामने आया,
हाथ देख भविष्य बताया |
बाबा का वरदान ने दो जगह असर दिखाया,
एक तो परिवार बढ़, दूसरा विदेश जाने का मौका आया |
बाहर जाने के लालच ने एक बार फिर घर छुड़वाया,
पर बाहर जा कर एक नया घर बसाया |
विदेश में पैसा कमाया,
हम दो हमारे दो का नारा भी अपनाया |
आईने में देख सफेद बाल, मन फिर घबराया,
तजुर्वे से अब सीखने का समय आया |
बच्चों के साथ कुछ साल अपने घर में रहने का मन बनाया,
इसी लिए आज ग्रह प्रवेश पर आप सब को घर पे बुलाया |

