रखता है हौसला जो सब कुछ डुबाने का वो दरिया भी समंदर की तलाश में है अभी बेख़ौफ़ है वो इश्क़ के अंजाम से शायद तहरीर-ए-मुक़द्दर की तलाश में है जर्रे जर्रे से गिरते रहे हैं जो आंसू मेरे अब शायद किसी ग़ज़ल की तलाश में है इश्क़ एहसान कर इतना कि दीदार दे रूह कब से तेरे दखल की तलाश में है जिंदगी तो गुजर ही जायेगी कैसे भी ये धड़कन रुके हुए पल की तलाश में है लाख समझाने पर भी न माने,जाने क्यों 'शिवि'  गुजरे हुए कल की तलाश में है