साहिल पर खड़े होकर,
कर रहा हूँ इंतज़ार,
कभी तो कहीं से कोई,
भँवर आएगी-
और ले जाएगी मुझे
अपने संग !
मुझे उस भँवर से बात करनी है,
“क्या तुम भी हो,
साहिल पर खड़े किसी
माँझी की तलाश में ?
जिसे समझा सको
अपनी प्यास, जो आज तक
नहीं बुझी ?”
मैं पूछूँगा उससे,
“क्यों इस क़दर निरन्तर
हो भटक रही ?
क्या नहीं मिला तुम्हें कभी
कोई ऐसा साहिल,
जिसके पास तुम ठहर सको
सदा के लिए,
या फिर ये ही तुम्हारी पहचान है,
हर बार नये साहिल से टकराना-
और पूछना वहाँ खड़े माँझी का दर्द,
और चुपचाप बहा ले जाना उसे,
आग़ोश में ले कर,
अपने साथ अपनी दुनिया में !


