अब नींद अच्छी नहीं आती,
फिर भी अंधेरे में खो जाता हूँ।
अब जागता हूँ रात भर,
फिर भी कुछ सोच में खो जाता हूँ।
अब रुकना अच्छा नहीं लगता,
फिर भी थक कर रुक जाता हूँ।
अब ठोकरों से परहेज़ नहीं होता,
फिर भी गिरकर रो जाता हूँ।
कुछ जिम्मेदारियाँ हैं इन कंधों पर,
फिर भी संभलते-संभलते गिर जाता हूँ।
एक हौसला है उन्हें पूरा करने का,
फिर भी हर बार टूट जाता हूँ।
खुद को हर बार समझाकर,
फिर भी उलझ जाता हूँ।
घायल कदम रुकते नहीं मेरे,
फिर भी रास्तों में रुक जाता हूँ।
