कहीं अरमानों को जगा के चला जाता है कोई,
फिर ख्वाबों में आके रोज़ सताता है वही।
ये तो बता कि मेरी खता क्या है, अंजान है ये दिल इसे पता क्या है, पूरी कर दूंगा तेरी हर नादाँ ख़्वाहिश को, तेरी ख़्वाहिश मुझे जरा बता क्या है। टूटे हुए दिल में भी तुम्हें बसाता है कोई, फिर ख्वाबों में आके रोज़ सताता है वही।
अगर ये नहीं तो बता वफ़ा क्या है, नाराज़ तुझे करने की सजा क्या है, तेरी चाहत ही मेरी मंज़िल है, और दुनिया में अब रखा क्या है। मेरी हालत भी क्या तुम्हें बताता है कोई, कि ख्वाबों में आके रोज़ सताता है वही।
~ पवन शुक्ला (गोरखपुरी)
