राजनीतिक पौधा कही भी पनप जाता है

सूखी बंजर धरती पर,

किसानों की कब्रो पर,

मजदूरो की मजबूरी पर,

जाति पर, धर्म पर,


इस पौधे की एक खासियत होती है

ये कभी मरता नही है

मरती है सिर्फ जनता,


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रचना-पवन

(अंश कहानी: काली स्याही काला ही लिखती है)