एक वीडियो


वो स्कूल जाती थी,

हंसती थी, मुस्कुराती थी ,

हाथ को बढ़ाकर अंजुलि में,

आकाश भरना चाहती थी।

खिलखिला के हँसती थी,

बालों को झटकती थी,

बाँहे फैला के कहती,

" पापा में पायलट बनूंगी"

छितिज की गोलाईयो को छूकर ,

ओझल हो जाऊंगी ,

उसके सपनों की उड़ान को,

पर लगना अभी बाकी था,

मगर सपनों के बिखरने में ,

बस एक वीडियो काफी था।

एक शख्स आया ,

जो 'वीडियो' बन गया ,

वीडियो उसकी जिंदगी में,

मानो ताले लगा गया।

हँसती खेलती जिंदगी मानो ,

उजड़ सी गई,

खेत बंजर हुआ जैसे,

रात झुलस सी गयी,

कौमार्य उसका यूँ बिखर सा गया,

हथेली पर रखा चाँद जैसे फिसल सा गया।

नया बस्ता जो लाया था स्कूल का,

वो बंद हो गया ,

गोरे उजले से चेहरे पर,

अंधेरा पर्दा पड़ गया।

बाप ने बेबसी दिखाई ,

फौरन कर दी सगाई ,

आनन फानन में किये हाथ पीले,

दूजे पल में विदाई ।

पूछती रही वो बाप से ,

क्या होता है यौन शोषण,

कैसे एक नग्न शरीर ,

करता है चरित्र विलोपन,

ये कैसा न्याय जहाँ,

शोषक सीना फुलाता हो ,

शोषित का सामाजिक पतन ,

और निर्दोष सजा पाता हो।

'शख्स' आजाद है ,

अदालती पेंचों में ,

मासूम के दावे बेबुनियाद हैं,

'शख्स' का विजयी हँसता चहेरा,

बाप को कचोटता है ,

हमारे समाज और न्याय की,

नींव झकझोरता है।

बेटी का सहा दर्द ,

जो पिता को सताता है,

हमारी सारी कानूनी किताबें को,

फर्जी बताता है।

सामाजिक प्रताड़ना से हारा बाप ,

खुदा से लड़ने जाता है ,

इस लंबी यात्रा में,

जहर को सारथी बनाता है ।।

-हैदर