आज फ़िर वहीं साँझ है
वहीं हम वहीं राह है
वहीं ढ़लता सूरज ओर
वहीं आसमाँ ग़ुलाबी सा
वहीं घूमती यारों की टोलियां
वहीं उनकी गुफ़्तगू का दौर है
आस-पास से आती आवाज़े
वहीं मेरा मन उदास है
वहीं चहल कदमी करते सब
वहीं राह पे दौड़ती गाड़ियां
चौतरफ़ा वहीं शोर है
इस शोर भीड़ में हम
अकेले में भी अकेलापन हैं।।
✒️पाटोदिया मुकेश✒️

