रूह नहीं मानती पर जिस्म को सोना है , आज कुछ भी तो नही , रण कल ज़ादा होना है !   तमाम किस्से कहानियाँ बन जानी हैं, ताबूत इधर बनना है,दीवार के उस पार भी रोना है!   जंग मुक्कमल होते होते यहाँ आ पहुँची है, भाई को मेरा  मुझे भाईजान का काम ए तमाम करना है!   ये भाषण ये सियासत कल भी हुई कल भी होनी है, नफरत की आग इधर जलनी है धुआँ उधर भी उठना है!   जमीं के लिए "खून की कीमत " जरूरी है , तेरे "वालिद" गम में हैं, बाबूजी को मेरे भी रोना है!