सोचा न था, पुनः ध्वनि कर्ण में जाएगी,
मन में न थी कोई अभिलाषा, 
न कोई पीर पराई,
फिर भी व्याकुल थी आत्मा,
उस अमृततुल्य ध्वनि के रसपान को,
आत्मा ने किया प्रभु से वंदन,
प्रभु ने किया स्वीकार उसका वंदन,
साधा संपर्क उसने स्वयं संध्या समय में,
परंतु प्रकृति को न स्वीकार था हमारा संपर्क,
 हो न पाया संपर्क हमारा,
फिर भी प्रभु को था संपर्क कराना,
इसलिए पुनः संपर्क कराने,
उन्होंने पुनः प्रयास कराया,
इस बार सफल हुआ प्रयास,
किया रात्रि में संपर्क, दोनों ने स्वयं,
 घड़ी भर लिया आत्मा ने, पूर्ण रसपान,
सोचा न था, पुनः ध्वनि कर्ण में जाएगी।
                         ...पारुष अग्रवाल✍️