वसीयतें...
एक वक़्त आया जब किसी ने अपने वक़्त की वसीयत उस के नाम लिख दी। वो ख़ुश थी...
फिर, एक और वक़्त आया, और उसके हिस्से का वक़्त कहीं और बिता दिया गया... वसीयत बाँट दी गयी और उसने फिर भी शिकायत नहीं की वो ख़ुश थी...
वो जानती थी, "एक गुमनाम रिश्ते की वसीयत पर किसी का हक़ नहीं होता वो सबमें बँटती है..."
