दो सौंधे सौंधे से जिस्मजब एक मुट्ठी में सो रहे थे इश्क़ के किस्से बेहिसाब दो रूहों में हो रहे थे। लिपट रहे थे तारे रात के तस्व्वुर में चाँद को,रात के दरिया में भिगो रहे थे। गैर मुमकिन था,खामोशियों का चुप रह जाना लफ्ज़ लफ्ज़ में सिमट कर कोई नज़्म बो रहे थे। बहुत दिलचस्प रहा दिल को दिल से लगाना दो वजूद एक दूसरे में जिस तरह से खो रहे थे।।
