इश्क़ की दास्तां जब बेज़ुबां होती है
जिस्मों से बंदगी फिर कहाँ होती है
रहमतें बरसती है जो उसकी फज़र में
तब कहीं जाकर कोई नयी सुबह होती है l
सब्र आता है उस परवरदिगार पर
ज़िक्र में जिसके इक तू ही वजह होती है l
क़ुबूल है मुझे खुद से सब फासले
गर क़ुर्बतें तुझसे इस तरह अदा होती है l
सँवरती है रात भी चाँद के दीदार में
और उसी में डूब जाने की सजा भी होती है l
इन्तिहाँ नहीं है यूँ तो इश्क़ की कोई
बिछड़ते है जिस्म,दो रूहें कब जुदा होती है!
