बस हो मयखाना मिरा अंजाम साक़ी
आज तय कर ले हज़ारो शाम साक़ी
आज टूटा दिल बहुत है गम ज़्यादा
आ गया है अब ले तेरा काम साक़ी
लग रहा है खुश बता क्या राज़ तेरा
देख तुझको खिल गई आवाम साक़ी
कुछ दिलों की तू सुना मैं भी कहूँ कुछ
शाम काटे आज चल बेजाम साक़ी
गूँजती तारीफ़ उसकी मयकदे में
होता जो महबूब का हमनाम साक़ी
दिल जला तो चंद शीशे तोड़ दूँगी
गैर हो जा फिर लगा इल्ज़ाम साक़ी
है अजब ही किस्म के ये होश वाले
ढूँढे दर तेरा हो के नाकाम साक़ी
नाम से तेरे पीने वाले पी रहे है
तो कभी तू भी ले मेरा नाम साक़ी
है ख़फा तो मयकदे का वास्ता है
यूँ न खाली छोड़ मेरा जाम साक़ी
है मदीरा से मुझे तुझ सी मुहब्बत
हैं मुहब्बत है मगर बेनाम साक़ी
पी रहे थे हम नज़र से हमसफर की
कर दे मयखाने को अब नीलाम साक़ी
देखते है अब सभी अंदाज़ तेरे
ये अदा भी हो न जाए आम साक़ी
भूल जाऊँ हाज़िरी देना उसे जो
भेजता है घर मिरे पैगाम साक़ी
क्या मिला तुझको जहाँ को दे तसल्ली
नाम तेरा हो गया बदनाम साक़ी
सिल दिया करता था मय से ज़ख्म सारे
'नूर' सा ही हो गया गुमनाम साक़ी

