मन मंदिर है, और तुम भक्ति,
तुम गर शिव हो, तो मैं शक्ति,
ख्वाब अगर हैं दर्पण दिल का, तो तुम हो इस दिल का चेहरा,
दर्द अगर आंखों की बारिश तो तुम हो बिन बारिश सेहरा
अंतर में बैठी गंगा की हलचल करती लहरें तुम हो,
जितनी जितनी कोलाहल मैं, उतने उतने ठहरे तुम हो..!
कलम स्याही और रातों की एकमात्र तुम हो आसक्ति,
मन मंदिर है और तुम भक्ति, तुम गर शिव हो, तो मैं शक्ति
◆पारुल ओझा


