सबके अपने-अपने दुख सबके मन में घाव,

कौन किसको मलहम लगाये सबके दुखते अपने घाव!


सबके सामने मुस्कुराते हैं ,

छुप-छुपकर अश्रु बहाते हैं!


दिल की पीड़ा आँखें बयान करती हैं,

आईने से चेहरा क्यूँ छिपाते हैं !


जीवन सुख-दुख की धूप छाँव है,

क्यूँ इतना घबराते हैं!


कोई सजा जिन्दगी से बड़ी नहीं,

ना जाने क्यूँ लोग मौत से इतना घबराते हैं!


पार्थ सिंह 'अमर्त'