ज़िंदगी भी एक अनचाही हकीकत में कहीं खो सी गई है,
सारा दिन तो ये खुद की, सबकी बातों से लड़ लेती है,
पर जैसे-जैसे ये अंधेरी रात आसमान पर चढ़ती जाती है,
वैसे-वैसे इस चांद के नूर से एक मायूसी छाती जाती है,
ये कैसी बातें हैं जो फ़िर ये आंखें खाली पन्नों से कर जाती है।।