"वो भी बचपन था "


सुना तो बहुत था पर माँ - पापा के बचपन के किस्सों में 

देखा तो बहुत था लेकिन कल्पना में, कैसे बिताते थे दिन जब नहीं होता था फ़ोन ना था इंटरनेट ।


हंसी खेल में , कैरम की बाज़ी में खिल खिला उठता था आंगन, रसोई से जब खुश्बू आती थी माँ - दादी की आवाज़ आती थी ।


साधारण था वो जीवन क्यूंकि ऑफिस के ऐसी की नहीं, खेत की ठंडी हवा छुह जाती थी |


कल्पना में ही सही मेरी माँ जैसा बचपन देखा है इस शहर की भाग दौड़ में कुछ पलों का सही मैंने जीवन देखा है ।


-परिशी गुप्ता