समाज मत सुधारो
क्या लिखु ऐसा कि कलम रुक जाये!
क्या कहूं ऐसा की हलक सूंख जाए!!
जवाब हर किसी के पास है अपनी सफाई में!
पर असल सवाल क्या है किसी को जानना ही नहीं है!!
गलती हम सबकी है इसमें!
पर ये तथ्य किसी को मनाना ही नहीं है!!
समाज मत सुधारो....पहले खुद के गिरेबां में झाँक पूछो!
क्या ख़ुदको सुधार पाओगे??
घर में बैठी शक्ति को अपने से ऊपर रख!
इस नए समाज के लिए तैयार कर!!
जब निकलो खुद से बाहर और मिला सको नज़र हर नारी से!
तो कहीं जाकर तुम खुदको इंसान कह पाओगे!!

