कब्रिस्तान में किसी पेड़ की तरह,
हम भी जीते है इस समाज में ।
जहां रुसवाई की कब्र है ज़मीन पर,
और उल्फ़त में लिपट के है,
घुटती मुरादे गगन में ।
आवाज़ भी, आह में आती है
रंगीन गलियों और ‘इज्ज़त’ के घर में ।
बस फर्क इतना की,
एक में बेरहमी महफ़िल सजाती है
और दूसरी, दीवाली तौफे के साथ
बंध कमरे की हक में ।
जहां शिव और पार्वती के अर्धनारीश्वर भी पूजनीय है,
वहां किन्नर की आशाओं का कब्रिस्तान भी है कई ।
रास्ते पर थकती कदमे इनकी,
खट खटाती है किसी की खिड़की ।
मर्द जो ठुकराते है इनकी पहचान
खुले दरवाजे की शोर में,
कई है शिकार इन्हीं के अय्याशी का, रात की चुप्पी में ।
नहीं है ठिकाना कोई इस कब्रिस्तान का,
हर गली, महफ़िल, घर, दिल में,
मिलती है ‘खुस्बु’ इसके फूलों का ।
कोई कब्र की रेत आंसू में भिक्ती है,
और कोई सूखे बूंदों की रेगिस्तान में तपती है ।
जहां गीत थी बचपन कि हँसी की,
वहां सन्नाटा है अब घुटते आवाज़ का ।
और सन्नाटा थी जिस बचपन में ही
अब वहां दर्द रुका है, किसी पन्ने में उत्तर जाने के लिए ।
मैं ज़िंदा पर लाश हूं , समाज के इस कब्रिस्तान का ।
- औरत
(पंख)


