ह्रदय में द्वेष मन में एक दृढ अंगार ले कर
मेरे ही लोग दरवाजे पर थे तलवार ले कर
गली सारी मेरे सम्मुख सुलगती जा रही थी
नियति विध्वंश पथ पर अब मुझे उकसा रही थी II
सुता, वनिता, पिता, माता खड़े थे साथ मेरे
मैं खिड़की पर खड़ा था सबके सम्मुख हाथ जोड़े
विनय करता रहा घंटो तलक पर वो न माने
लगा कर आग घर में बोले बाहर आ तो जानें II
कलम कागज़ जो मेरी ज़िंदगी थी कैसे तजता
मैं बस पन्नों पर लड़ता हूँ ज़मीं पर कैसे लड़ता!
किया अनुनय कि घर को लूट लो हमें भाग जाने दो
तुम्हे इंसान हम मानें भला कुछ तो बहाने दो II
सहन कि आखिरी सीमा तलक हम आग से जूझे
अनल ने बांह जब पकड़ी तो छत से भागकर कूदे
किया निर्वस्त्र हमको फिर हमारे धर्म को कोसा
पकड़ कर केश माँ के आखिरी क्षण तक घसीटा II
पिता के चक्षुओं को गोद कर तेजाब डाले
मेरी पत्नी को वैश्या कह के स्तन नोच डाले
मैं हर क्षण कोटि मृत्यु मर रहा था
धिया निर्दोष है छोटी है विनती कर रहा था II
निकट आ कर तभी बोलै कोई ' आ न्याय देता हूँ '
सुता यदि सौंप दे तो तुझको जीवन दान देता हूँ
व्यंग्य अधम का उर से जैसे तरल अग्नि टकराया
शिथिल-पराजित रक्तशिरा में लावा सा चढ़ आया II
व्यग्र सदृश बरसा दुर्जन पर रद से कंठ कुतर डाला
मेरु समान दम्भ पामर का पैरों तले कुचल डाला
भाले, बरछी, डंडे मुझको शून्य किये जाते थे
वो बिटिया को खींच भीड़ की ओर लिए जाते थे II
कानों में धी का विलाप फीका पड़ता जाता था
धर्म पताका आसमान में फर-फर उड़ता जाता था
कैसी दुर्मति है कि हत्या ईश्वर कि अभिलाषा है
जो इक धुन पर हंस पड़ता था वो ही रक्त का प्यासा है II
आहुति दे कर मानवता की किसका ख़ुदा महान बनेगा
ईश्वर यदि मुझे पूछने देगा पूछूंगा 'इंसान बनेगा!' ....
©PankazKaladhar


