उर जल उठता है भट्ठी सा 

वो जब-जब पलक उठाता है 

मैं ज्यों-ज्यों उस पर मरता हूँ 

वो ओझल होता जाता है 

वह सुने मुझे किसी ठौर कभी 

यह भी तो अपने हाथ नहीं 

संवाद हेतु कोई क्षद्म करूँ 

यह अपने बस की बात नहीं 

प्रत्याशा उससे मिलने की 

मेरे धैर्य कुतरती जाती है 

प्रश्नावलियां कैसी-कैसी 

आरोपित होती जाती हैं 

फिर आकस्मिक संध्या होना 

अभिलाषाओं का जड़ होना 

रात्रि की शांत हथेली पर 

अनवरत अश्रुओं का बहना 

अरुणोदय हँसता है मुझपर 

मैं अपने भाग्य पे हँसता हूँ 

असमंजस चलता है आगे 

मैं पीछे-पीछे चलता हूँ 

स्वीकार कर लिया है मैंने 

सारे दुःख को प्रसाद समझ 

मेरा बस यही स्वीकरण है 

तू नेह समझ या विषाद समझ

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