मैं पिता जी के घर लौट आया हूँ
जो पुराना हो चला है
स्मृतियों की तरह
आले में धरी गैर जरुरी चीज़ों की तरह
ओसारे में पड़े पलंग की तरह
शायद मेरी तरह
छुटपन से ही शहर खींचता था
अख़बारों के माध्यम से परिचित हुआ
शहर के बड़प्पन से
उसके समावेशी स्वाभाव से
पहली नौकरी पिता जी के सिफ़ारिश पर मिली
गाँव से सटे क़स्बे में
दूसरी परिश्रम से मिली
शहर में
गाँव से कुल चालीस कोस दूर
धन संचय की लालसा
दाम्पत्य जीवन का सुख
नए हर्ष और विषाद से परिचय
देखते ही देखते जवानी
किसी क्षणिक इंद्रधनुष सी
अतीत में लुप्त हो गयी
बच्चे बड़े हो रहे थे
उनकी जरूरतें प्राथमिकता बन गयीं
उनका एडमिशन, कम्पटीशन, सिलेक्शन
परत दर परत ज़िन्दगी का वरक़ उखड़ता गया
बच्चे जवान हुए
पसंद की जगहों पर चले गए
वैसे ही जैसे मैं चला आया था
गोंडा रेलवे स्टेशन पर कष्ट से ठिठुरते
पिता को अकेले छोड़कर
नियति और आकांक्षाओं के भरोसे
बच्चों की सफलता ने
हमें एक दूसरे से दूर कर दिया
घर में उनकी कमी खटकती थी
सांझ को भोजन के समय
उनकी अनुपस्थिति
विचारों को बेस्वाद कर देती
पत्नी को टॉयफायड हो गया
जितना बन पड़ा सेवा-सुश्रुवा की
पर उतना नहीं की उन्हें बचा पाता
अब शहर, घर, टी वी , अख़बार
सब नीरस लगते
मुझे पिता जी की याद आती
माँ की भी
पत्नी की मृत्यु के पश्चात तीनों बच्चे
घर आए बहुत आग्रह पर
मैं रो पड़ा
सबने सुझाव दिया
मेड रख लो
मैंने साथ जाने की इच्छा जताई
बताएँगे कहकर चले गए
कुछ हफ्ते टालते रहे
फिर कहा एडजस्ट नहीं कर पाओगे
मैंने थैले में दो जोड़ी कुर्ते धरे
अगले दिन अलल सुबह पैसेंजर में बैठ गया
उसी पैसेंजर ट्रेन में
जिसमें बैठ कर भूल गया था मैं पिता जी का दुःख
उनके अनुरोध
और माँ के पवित्र स्नेह का वो ऋण
जो मुझ कायर से स्वीकारा न गया
सब कुछ बदल गया था
इक्का-दुक्का ही कच्ची सड़कें
नजर आतीं
बाराबंकी स्टेशन पर प्लेटफार्म की
संख्या में वृद्धि हो गई थी
कर्नलगंज स्टेशन का नाम कर्नलगंज क्यूँ
पड़ा मुझे मालूम था
कचेहरी के पास ट्रेन कुछ समय
क्यूँ खड़ी रहती है
मेरी जिज्ञासा का विषय नहीं था
रास्ते जब तब अपरिचित जान पड़ते
हर ओर बिजली के खम्भे रात्रि की प्रतीक्षा में
खड़े थे एकदम सीधे
पटरी के दोनों ओर बने
घरों से उग आए थे जिओ, एयरटेल, वोडाफोन के टावर
वही रास्ता
वही ट्रेन
वही मैं
पर हम सब के बीच
ढुर गया था समय का एक विशाल कलश
स्टेशन पर उतरा तो
हर ओर पिता जी की बनती बिगड़ती
आकृतियों ने मन बेचैन कर दिया
इसी स्टेशन पर कितनी बार
रिसीव करने आए थे मुझे
छुपा लेते थे देखते ही अंक
में हिरनी की तरह
मैं लेटा हूँ इस वक़्त उसी बरामदे में
जहां बिछता था ठण्ड में पुवाल का बिस्तर
और जलती थी ताखे में ढिबरी रात भर
दिवार का पलस्तर
झर रहा है
पतझड़ की तरह
उम्र की तरह
पिता जी द्रुत गति से ओझल होते जा रहे हैं
स्मृतियों से
मुझसे
मैं कितना पीछे छूट गया हूँ
©कलाधर पंकज


