नेताजी जब से उतरे चुनावी मैदान में
तांता लगा है शहर के हर कब्रिस्तान में
जो दावे कर रहे थे परमार्थ के नित-दिन
एक्टिविस्ट क्वारंटाइन हैं अपने मकान में ||
उलझा के सबको दवा और दाल-भात में
घपलों का खेल चल रहा दफ्तर औ हाट में
हाय! उन्हे नसीब में काँधे भी न मिले
कल रात जिनके पास हम सोये थे खाट में ||
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