तुम ही हो आचार्य और शुभ-कार्य तुम हो
हमको जिसकी कामना हे! आर्य तुम हो
मैं तरुण अज्ञान हूँ, आधार तुम हो
मैं क्षणिक संदेह हूँ, जयकार तुम हो।।
तुम क्षितिज की ऊष्मा हो, तुम धरा का तेज हो।
तुम ही रण की शक्ति हो, तुम ही चिता की सेज हो।।
तुम सुमन की गंध हो, अनुराग तुम हो
प्रेयसी का क्षोभ हो, वैराग तुम हो
तुम ही मेरी प्राणवायु कल्पना के नाव तुम हो
तुम ही मेरी चेतना हो और उसके भाव तुम हो।।
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