सर्वत्र व्याप्त यह गहन मौन
मेरा ह्रदय छीलता जाता है
बढ़ता विधर्म चहुँ ओर
मुझे चुपचाप लीलता जाता हैI
क्षत-विक्षत अंग अधूरा तन
हाय! यह लाश कहा रखूं
संतापों के यह तीक्ष्ण बाण
दुःख का आकाश कहाँ रखूं II
किस ठौर धरूँ निज स्वाभिमान
किस कुण्ड में स्मृतियाँ फेंकूं
पाने इन प्रश्नों का निदान
किस वृक्ष तले जा कर बैठूं I
अपकर्म से लिपि हुयी धरती
किस ठौर धरूँ निज चरण कहो
हे वत्स ! निवेदन है तुमसे
हत्याओं को न मरण कहो II
यह अविश्वास का निर्मम तम
मेरा धैर्य छीनता जाता है
यह दुःसह व्यथा भीतर-भीतर
मुझे नित्य सीलता जाता है II
©KaladharPankaz

