मैं छत के छोर पर उंकड़ू बैठा
दातून कूंचता
खंगाल रहा था दंगे के बाद की सुबह
निर्जन गलियारे
मौन कपाट
अधखुले झरोखे
हवा की देह से झर रही थी
दुर्गन्ध बासी रक्त की
डगर के बीचो-बीच
छोड़ गया था कोई एक दरांती
संभव है पूर्ण हो चुका था
दरांती रखने का उद्देश्य
संख्यातीत चप्पल-जूते पड़े थे
भौचक्के
उन पैरों की प्रतीक्षा में
घुसे थे हौले-हौले जो इन्हें खरीदने
किसी दुकान में
मैं कल घर पर नहीं था
बिटिया के आग्रह से पराजित हो
गया था उससे मिलने
कर लिया था उसने
प्रेम-विवाह
सात वर्ष पहले
मेरी इच्छा के विरुद्ध
सोंचता हूँ यदि यहाँ होता
तो किस की ओर होता
किसे बचाता
स्वयं के अलावा
ओसारे में बंधी गाय को
या पड़ोस के टिंकू को
कैसा अनुभव होता
जब धंसा देता कोई अचानक से
कलेजे में छुरी
पुत जाती देह रक्त से
मृत्यु की कल्पना से
कितना प्रगाढ़ होता दुःख
संसार से विछोह का
छूट जाता मेरा भी चप्पल
इसी सड़क पर कहीं
पर भला कब तक
ताकता मेरे लौटने की राह
संभव है कोई और देखता
उसे अपने छत के मुहाने से
उंकड़ू बैठ
दातून चबाते
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