जैसे घोड़े के खुरों में

 नाल ठुकी होती है

 ठुका हूँ मैं उसी तरह अपेक्षा

और उम्मीद के पैरों में 

पैर जहाँ-जहाँ ले जाते हैं 

मैं जाता हूँ इस उम्मीद में 

कि एक दिन यह स्याह निराशा 

जो मेरी पहचान बन गयी है 

हार जाएगी मेरी यात्राओं से 

यात्राएं जिनमें मैं 

अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हूँ 

ठीक वैसे ही ज्यों

 प्रयास में असफलता का भय 

बीमारी में मृत्यु का भय और 

वर्तमान में भविष्य का भय 

मुझे विस्मय में डालता है 

अपेक्षा का क्रूर ह्रदय ..