आँखें मिलती हैं
लब मुस्कुराते हैं
उंगलियाँ चलती हैं
फ़ोन के कीपैड पर
इश्क़ आजकल
कुछ यूँ होता है।
नज़दीकियां बड़ती हैं
मुलाकातें होती हैं
हथेलियाँ टकराती हैं
लब थरथराते हैं
सेल्फियां ली जाती हैं
इश्क़ यूँ पनपता है।
रोज़ ही मिलने को
दिल मचलता है
बाहों में भरने की
ज़िद्द करता है
गूगल हैंगआउट्स पर
इश्क़ खूब उबलता है।
अनबनें होती हैं
टकरारों में दिन कटते हैं
अक़्सर कड़वाहटें इस
कदर तक बड़ती हैं
व्हाट्सएप्प पर ब्लॉक
इश्क़ यूँ तमाम होता है।