निदा फ़ाजली घबरा रहे हैं बैंक जाने में, इन शब्दों में उन्होंने अपना ग़म जताया है: अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए घर के बिखरी हुई नोटों को सजाया जाए घर से है बैंक बहुत दूर चलो यूं कर लें किसी एटीएम की लाईन में खुद को लगाया जाएनोटबंदी पर पंकज प्रसून की ग़ज़ब चुटकी
कैफ़ी आज़मी लोगों से पता कर रहे हैं: तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो क्या नोट सौ के छुपा रहे हो आंखों में नमी, हंसी लबों पर क्या लाइन में लग के आ रहे हो
जिग़र मुरादाबादी लाइन में लगे हुए कह रहे हैं: हम को हटा सके किसी लाइन में दम नहीं हम से बनी है लाइन,किसी लाइन से हम नहीं
बशीर बद्र की समझाइश. कोई हाथ भी न लगाएगा, जो पड़े हों पांच सौ राह में ये तो दो हजार की लाइन है , जरा फ़ासले से खड़े रहो बन्द नोटों को करो लेकिन ये गुंजाइश रहे गर पुराने नोट मिल जाए तो शर्मिंदा न हों
गोपालदास नीरज की अभिलाषा. अब करेंसी कोई ऐसी भी चलाई जाए जिसमें चिप हो मगर रोटी भी लगाई जाए
मुनव्वर राणा के नोट नहीं बदल पाने पर. नये कमरों में अब नोट पुराने कौन रखता है बुढ़ापे में बचा अपनी जवानी कौन रखता है हमीं गिरते हुए रूपये को थामे हैं अब तलक वरना सलीके से गवर्नर की निशानी कौन रखता है (साभार- पंकज प्रसून )


