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'माँ का बुना स्वेटर छोटा नहीं पड़ता...' - पँकज प्रसून

माँ का बुना स्वेटर छोटा नहीं पड़ता.. मेरी अलमारी आज  कोट, शेरवानी, जैकेट सदरी ब्लेजर से भरी पड़ी है जो साल भर में पुराने लगने लगते हैं लेकिन इन्ही सब के बीच एक स्वेटर भी है जो सालों के बाद भी नया है जिसे पहनकर मै और नया हो जाता हूँ यह माँ के हाथ का बुना स्वेटर है कपड़े जवानी के बाद भी छोटे पड़ते हैं जब लम्बाई की जगह चौड़ाई बढ़ती है लेकिन माँ का बुना स्वेटर कभी छोटा नहीं पड़ता यह एकदम तुम्हारी बाहों की तरह होता है जिसकी परिधि असीमित होती है
जब कड़ाके की ठंड पड़ती है और ये जैकटें ठंड को नहीं रोक पाती तो तुम्हारा स्वेटर पहन कर निकलता हूँ और तुम्हारे लगाये फंदों में सर्दी झूल जाती है झूले भी क्यों न ठंड को भी पता है कि माँ ने यह स्वेटर काँपते हुए बुनी है आज जब रिश्तों को बिखरते देखता हूँ तो तुम्हारा स्वेटर बुनना बहुत याद आता है एहसासों का ऊन लेकर ममता और धैर्य की दो सलाइयों से तुम जीवन को बुन देती थी और कहती थी कि खाली हूँ स्वेटर बुन रही हूँ अब लगता है कि
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