सुबह हुई शाम हुई, ज़िंदगी थोड़ी कम अनजान हुई,

बिखरते सूरज की किरणों से फ़िर नई एक पहचान हुई|


ओस की बूंदों को देखकर जीवन की नीरसता कम हुई,

यही बात बहती कल-कल हवा शायद मुझसे कह गई|


अड़चनों के पश्चाताप में कब तक निरर्थकता का साथ दें,

इन्हीं असमंजस में काम आएंगे सागर से अडिग मंसूबे|


मौंजो के दरिया को फ़िर से आने का अवसर तो दें,

शायद यही बात फ़िर हमसे कहते हैं सुबह के परिंदे|


ज़िंदगी की उड़ान को लोगों के बेवजह कथनों से दरकिनार कर,

जीवन का मंत्र यही है जो करता है हमारी तम्मनाओं को अमर|