परिश्रम का तो मोल न मिला कभी,दो वक्त की रोटी भी नसीब से दूर,जेब में खनकते थोड़े सिक्के, हालात से मजबूर,सुबह को निकले, तो शाम का पता नहीं,ऐसा ही है अब, मेरे देश का मजदूर, मेरे देश का मजदूर।