इक़ रिश्ता जिसमें गीली मिट्टी सा मैं था,
कुम्हार सी वो मेरी थी।
खेला मुझे हर खिलौना बनाकर ,
मैंने न की बनने में कभी देरी थी।।
अब इक़ अहद बीत गया था खेले मुझसे,
फिर उसे तलब हुई।
पर टूटा ये खिलौना इस दफा,
शाय़द उस मिट्टी में न बची नमी थी।।


इक़ रिश्ता जिसमें गीली मिट्टी सा मैं था,
कुम्हार सी वो मेरी थी।
खेला मुझे हर खिलौना बनाकर ,
मैंने न की बनने में कभी देरी थी।।
अब इक़ अहद बीत गया था खेले मुझसे,
फिर उसे तलब हुई।
पर टूटा ये खिलौना इस दफा,
शाय़द उस मिट्टी में न बची नमी थी।।