कविता लिखता तो नहीं लिख जाती हैं,
जब, स्मृतियां व कल्पनाएं अकेले में जग जाती हैं,
जगने का सिलसिला बढ़ता जाता है,
एक-एक करके काफिला बन जाता है,
सभी जानते हैं काफिले में भिन्न भिन्न भिन्न लोग होते हैं
कुछ हँसते हैं तो कुछ रोते हैं,
ऐसे ही स्मृतियां व कल्पनाएं,
कुछ खिलखिलाती सी,
कुछ छिपती, बचती, दामन छुड़ाती सी,
कुछ नहीं जगतीं, तो अंगड़ाई ले कर रह जाती हैं
पर है तो सदा साथ कहीं नहीं जाती हैं
उनमें से कुछ, चुपके से कविता बन जाती हैं ,उनमें से कुछ, चुपके से कविता बन जाती हैं