नदी तो बहती है चुपचाप

हमसे कुछ नहीं कहती है

रहती अपनी मस्ती में

अपनी ही धून उसकी

अपना है आगाज़ फिर क्यों है ?

ये कोलाहल

के नदी ने सब कुछ तोड़ दिया खुद बह गयी आगे आगे 

और हमको पीछे छोड़ दिया सारा दोष क्या नदी का है ?

कुछ हमारा भी तो हाथ है

उसकी जगहों को हमने रोका

उसकी राह को हमने टोका

जहर घोला उसके दामन में

फिर क्यों हो वो उदार ?

नदी का कोई दोष नहीं

अच्छा है ये अत्याचार

नदी तो बहती है चुपचाप

हमसे कुछ नहीं कहती है