भाग एक
ये लहराते द्रुमों की छाँव में,
पसरते पुराने दुःख
और विषैले विषाद;
जिन्हें बहा दिया
उन रुकी हुई घटाओं की
बरसती बारिशों ने,
बारिशें,
जो थी तुम्हारी अभिव्यंजनाएँ
और जो अब बन चुकी हैं तुम्हारा अभिज्ञान;
जिनकी स्याह स्मृतियों में,
उभरता उजला चाँद,
व्याख्या करता है विस्मृतियों की;
जो मानो रंगों का ढेर,
बिन हुए रँग देता
हृदय की दीप्तियों को!
©Keshav S. / V.

