तीसरे पहर के घण्टे
कितने बेसुध और बेजान!
जान पड़ते हैं कुछ गतिहीन से।
धूप तब सूरज की भंगिमा बन
दिन चमकाने का काम करती है,
सीधी-साधी सी दिखने वाली,
तपाती खुद है
और सूरज का नाम करती है।
छोटे पौधों को छूती हुई,
कोमल पत्तों से फिसलती हुई
सघन भूमि में गहनता का विस्तार करती वह,
बारिस के पानी से जा मिलती है।
प्रकाश की पराकाष्ठा और रेत की रोशनी
दोनों एक साथ चमकती,
सुनहला रंग, मानस पर उडेलती
और कवि के लिए बन जाती मरीचिका!


