महबूब मेरे, तेरी आंखों से, मैंने पी ली है मदिरा सारी,
अब कौन जगाए, बेहोशी से, मैं भूल चुका दुनियादारी ।
महबूब मेरे, मुझे इतना बता, तू कौन नगर से आई है,
इतनी मदिरा, इन नैनों में, तू भरकर कहां से लाई है ।
तू चलती फिरती मधुशाला, कहीं जाम जमीं पे झलक ना जाए,
नजरें झुका कर चला कर, कहीं कोई खुशी से, मर ना जाए ।
वक्ष, वृक्षसे फलित है, तू हिरण चौकड़ी भरती है,
तू तेज कटारी से तिखी, इतना जुल्म क्यों करती है ।