अभी-अभी शहर का मौसम बदला है

जश्न की हर बात पर आज़माईशों का रंग बदला है.


गश खा रहा है बागबां भी

परस्तिशों के मौसम में नुमाइसों का भी दम निकला है पशेमान है नारास्ती भी..

काविशों के दौर में हर शय में साजिशों का भी ख़म चला है...


©पम्मी सिंह 'तृप्ति'...✍️

नारास्ती= कपटता, बेईमानी, परस्तिश= पूजा, अराधना,काविश -प्रयत्न, पशेमान= लज्जित