सांसें

सकल जग सजीव तब तक

संरचना में सांसे हो जब तक

बीते पल क्या अच्छे या बुरे

अगले पल की आस जब तक ।


यह संसार परिवर्तन ही तो है

सांसें आख़िर अर्पण ही तो है

बहुत हवा है इस जग में वैसे तो

सांसें प्रभु का तर्पण ही तो है ।


कान्हा में बस्ती मीरा की सांसे

राधा पर अटकी कृष्ण की सांसे

कबीर का तो भाव अनंत अनन्य

कृष्ण भजन से चलती सांसे ।


सांसों का है खेल न्यारा

स्थिरता से पूर्ण अंधियारा

पूरी दुनिया जीत कर भी

ये मानुष अपनी सांसों से हारा ।।

© पमेश कुमार