यह जो तुम्हारी आंखों में नूर है

इसी से तो हमारा यह गुरुर है

मन करता है तुम्हारी आंखों

में अपनी आंखों को देखूं

मगर तुम्हारा घर यहां से बहुत दूर है ।

    हमारे शरीर कण–कण अर्पित

    समय का पल–पल समर्पित

    हम हवाओं के खिलाफ बहते हैं

    और हम जो करते हैं उसे

    इश्क नहीं पागलपन कहते हैं ।...