कीचड़ में कमल


कमल कीचड़ में खिलता है

इस पर तो कोई विवाद नहीं

वो कमल तो कितना प्यारा है

पर कीचड़ किसी को याद नहीं ।


पत्ते पर ओंस के कण है जो

कल को जिनका नाम नहीं ,

जल से भरे घट में जैसे

तेल की बूंद का काम नहीं ।


राह में बिखरे कंकड़ – सुइयां 

कहाँ शुरू तो खतम कहीं

बदले रास्ते को संवारने के

संभाल लो अपने पैर वहीं ।


सोच और नीयत सबकी पृथक

जरूरी नहीं हो हमारे जैसी  

नीयत रहती बनती बदलती

सोच जरूरतों में मिलती रहती । 

© Pamesh Kumar

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