जाने कितनी बार ये मन      बचपन की गलियों में घूम आया 

 दीवाली के दीये से रौशन हो     जब भी भाई-दूज आया 

कट्टी-बट्टी, धमा-चौकड़ी 

सुबह-शाम की मान मनाई 

एक दूजे को सदा सताना 

माँ की डांट से सदा बचाना 

सच.. बचपन कितना प्यारा था 

समय चक्र है  कैसा घुमा 

जग की भूल- भुलैया में 

रिश्तों की पतवार लिए 

अब बहना रस्ता तकती है 

कई राखी भी निकल गई 

क्या आओगे इस भाई-दूज पर 

माँ ने जो हमको सिखलाया था 

एक दूजे का साथ निभाना सदा 

भाई - बहना का बंधन ऐसा 

बचपन का है स्नेह बंधा 

 जाने कैसे तुम भूल गए 

भाई अब तो आ जाओ 

 टीका तो लगवा जाओ 

भाई-दूज का पावन व्रत है 

रक्षा- सूत्र बंधवा जाओ....

       बहना याद करे.