अजीब सी दुविधा में फसा ये मन था,
तैरना आता नही था खयालों के समंदर में और डूबता हुआ तन था,
तिनके की तलाश थी की कोई सहारा मिल जाएं कही से,
ढूंढा तो हमने पाया इस भीड़ में भी अकेला हमारा मन था,
कहां जाएं किस्से सहारे की उम्मीद रखे,
जब अपनो ने ही ठुकराया हमारा गम था,
जीए जा रहे थे इक अंधेरी गुफा में खयालों की,
रोशनी देने वाली मशाल में आग लगाने वाला माचिस गुम था।

