रुपये


आओ सखा बाग़ में चले,

बचपन में जो सिक्के बोये थे आज पेड़ बन गए होंगे,

अब हमें गांव छोड़कर शहर जाने की जरुरत नहीं,

पेड़ पर खूब रुपये उग आये होंगे,

तोड़ लेंगे कुछ रुपये और राशन ले आएंगे,

फिर साथ मिलकर खाना खाएंगे यही अपने गाँव में ! 


- पलक अग्रवाल