गढ़ दी काया मिटटी से,
फूक दिए देवी पारवती ने उसमे प्राण !
नहीं दिया मिलने, पिता शिव को उसने,
कहा रुक जाओ, माता कर रही स्नान !
क्रोधित हुए शिव, काट दिया शीश,
ले ली उसकी जान !
व्यथित उमा रोने लगी,
बोली लौटाओ मेरा सूत इससे हैं मेरी पहचान !
शांत हुए शिव, ढून्ढ लाये कहीं से,
लगा दिए गज के मुख और कान !
पुनर्जीवित हुआ गौरीनन्दन,
बन गया देवो की वह शान !
प्रकट हुए सभी देवता नभ मैं नतमस्तक हुए,
करने लगे गणपति गुणगान !
बड़ा हुआ वह बालक जब,
बना वह बहुत विद्वान !
लिख दिया वेद व्यास संग,
महाभारत एक काव्य महान !
हे मंगलमूर्ति! हे विघ्नहत्र्ता!
करो कृपा, दो हमें रिद्धि सिद्धि का दान !



